जो कल तक साथी थे, आज वही पीठ में छुरा घोंप रहे हैं पत्रकार का बुरा वक्त यही पहचान कराता है?

आज हिमांशु के साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसका अहसास उसे स्वयं है, अपनी गलती का बोझ वह भी महसूस कर रहा है इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे घिनौना और खतरनाक पहलू है, वह है हमारे ही पत्रकार साथियों की भूमिका, जो लोग सच का पहरेदार कहलाते हैं, वही आज उसकी बची-खुची इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाने पर तुले हैं और यह ज़हर किसी भी ज़हर से कम नहीं है।
गलती इंसान से होती है, मगर उसे सरेआम नोंचना, चरित्रहनन की प्रतियोगिता में बदल देना और टीआरपी या निजी रंजिश के लिए किसी को सार्वजनिक फाँसी पर चढ़ा देना यह पत्रकारिता नहीं, भीड़तंत्र है, सवाल यह नहीं कि हिमांशु निर्दोष है या दोषी, सवाल यह है कि क्या किसी पत्रकार या पत्रकारिता से जुड़े लोगों को यह अधिकार मिल गया है कि वह न्यायाधीश, जल्लाद और गवाह तीनों एक साथ बन जाए?
आज जो शब्द लिखे जा रहे हैं, जो वीडियो बनाए जा रहे हैं, जो सुर्खियाँ चलाई जा रही हैं वे सच के लिए नहीं, संतुष्टि के लिए हैं यह वह संतुष्टि है जो किसी के गिरने से मिलती है, यह वह मानसिकता है जो साथी पत्रकार को इंसान नहीं, शिकार समझती है, और यही मानसिकता पत्रकारिता को अंदर से खोखला कर रही है। अगर हिमांशु ने गलती की है तो पुलिस जांच कर रही है इस पर कानून अपना काम करेगा।
लेकिन उसके नाम पर चल रहा यह मीडिया-ट्रायल, यह संगठित अपमान, यह पेशेवर हत्याकांड इसका हिसाब कौन देगा? आज अगर हम चुप हैं, तो कल यही ज़हर किसी और के हिस्से आएगा, तब शायद नाम बदला होगा, लेकिन साज़िश वही होगी, यह समय तालियाँ बजाने का नहीं, रुकने और सोचने का है, क्योंकि जिस दिन पत्रकार अपने ही साथी की इज़्ज़त को रौंदने लगे, उस दिन पत्रकारिता मरती नहीं उस दिन उसे सरेआम मार दिया जाता है।
कहना कड़वा है, लेकिन सच यही है

